Sunday, 29 April 2018

रिश्ता-ए-ख़ून


वो रिश्ता-ए-ख़ून ही तो है
जो ख़ून-ए-रिश्ता का शिकार बन तड़प रहा है ।
बहता है तो बहने दो लहू को, क्या फ़र्क़,
अब चश्म-ए-खुश्क लिए कितना रोएं ।

Saturday, 28 April 2018

वक़्त वक़्त की बात



वक़्त का क्या,

कभी ये लड़खड़ाए तेरी तलाश में, तो कभी दौड़े तेरी आगोश में,
या फिर थमे रहगुज़र-ए-ज़िन्दगी पे तेरी फुरक़त में ।

ये तो वक़्त वक़्त की बात है ।

Tuesday, 24 April 2018

काश



काश मानव के हर दोष को दंड संहिता के ज़रिये सुधार सकते
काश समाज की हर बुराई को नियमों के ज़रिये हटा सकते
काश दुनिया के हर जुर्म को कानून के ज़रिये मिटा सकते
काश इन सब तरक़ीबों से पीड़ितों की पीड़ाएं दूर कर सकते

काश ...

दूरियाँ


इनसान इनसान के दरमियाँ
इतनी दूरियाँ?

इस छोटीसी धरती पर जगह
इतनी कहाँ?

तेरी मेहरबानियां


दिल भर गया तेरी अनचाही मेहरबानियों से, ए ख़ुदा,

अब ये अनचाही सांसें वापस लेनेकी एक और मेहरबानी कर ।

Monday, 23 April 2018

रात और दिन


निशा से मिलने की नाकाम कोशिशों में शर्म से चेहरा लाल करके सागर में डूब गया है दिन.

नादान है, ये नहीं जानता कि उसे किसी भी जनम में कामयाबी हासिल नहीं होनी है.

Saturday, 21 April 2018

मेरे अपने


वो माँ बाप जिन्होंने बड़े प्यार से पाला
वो भाई बहन जिनके साथ जी भर के खेला
वो मित्र जिनके साथ बांटा जीवन का प्याला
वो जीवन साथी जिनके संग सुख दुःख झेला

उठा एक तूफ़ान उड़ा जीवन का तिनका
न कोई  है चाह, न ही मीत मन का
न रिश्ते हैं न नाते, न साथी जीवन का
बस एक ईश्वर, नहीं कोई जिनका

तलाश में हैं ये आँखें जो प्यासी
धड़कन बनी इस दिल की उदासी
न कोई है उम्मीद किसीसे ज़रासी
जीवन बना है एक मंज़र मायासी

कहती है गीता कि सब कुछ है माया
न बाप और भाई, न बहन और मैया
यहीं पर लुटानी है जो कुछ भी पाया
तेरे साथ क्या जाए, क्या तूने लाया

दिल-ए-नादाँ तू खोल आँखें अपनी
यहां की है हर चीज़, यहीं पे है रहनी
न साथ आयी है, न ही साथ जानी
पहचान ईश्वर को, कुछ और न अपनी

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