Sunday, 11 September 2016

मैं चला


कश्मकश-ए-ज़िन्दगी से कौन जूझे
हक़ीक़त-ए-हयात को कौन बूझे
दांव-ओ-पेंच-ए-जीवन को कौन समझे
नावाकिफ हूँ राज़-ए-हयात से, मैं चला ।

मोहब्बत का खतरा कौन लेले
जीवन के पापड़ को कौन बेले
फुरक़त--महबूब को कौन झेले
नावाकिफ हूँ राज़--हयात से, मैं चला


शरीक़-ए-हयात को खोने का ग़म
ता ज़िन्दगी न होगा यह कम
दिल के अंदर है यह एटम बम
नावाकिफ हूँ राज़-ए-हयात से, मैं चला ।

जीवन के सफर को जाना
मुश्किल--राह को पहचाना
दुनिया की भीड़ में रहा अनजाना
नावाकिफ हूँ राज़--हयात से, मैं चला

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